"जंग -ए -आज़ादी और लखीमपुर खीरी (भाग - 2)"

 

जब पूरे देश के माथे पर विधाता न दुर्भाग्यपूर्ण दासता लिखी थी तो धौरहरा का एक जांगडा राजा विशाल अंग्रेजी सल्तनत के आगे कब तक टिकता । नवम्बर 1858 मे ही धौरहरा नरेश इन्द्रविक्रम सिह को उनके भाई सुरेन्द्र विक्रम सिह के साथ अंग्रेज शासन ने गिरफ्तार कर लिया । उनकी रियासत वीरता पुरस्कार के तौर पर अंग्रेज कप्तान हिरसी को दे दी गई जिसे बाद मे राजा कपूरथला ने खरीद लिया ।


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कुछ समय बाद सुरेन्द्र विक्रम सिह को अंग्रेजो ने रिहा कर दिया जबकि राजा इन्द्र विक्रम सिह अंग्रेजी जेल के लौह आवरण मे विलीन हो गए । गिरफ्तारी के बाद राजा इन्द्रविक्रम सिह का कोई रिकार्ड नही मिलता, लेकिन किवदंती है कि राजा के सौन्दर्य और वीरता पर मुग्ध एक अंग्रेज अफसर की बेटी राजा को अपने साथ ब्रिटेन ले गई थी । फरवरी 1856 से आठ नवम्बर 1858 तक तत्कालीन मोहम्मदी जिला (अब खीरी) पूरे 33 माह अपने बाहुबल से स्वतंत्र रहकर ब्रिटिश सत्ता से लोहा लेता रहा । कुछ दिनो बाद यहाँ डिप्टी कमिश्नर नियुक्त हुए डब्ल्यू सी उड ने मोहम्मदी से हटाकर लखीमपुर को जिला मुख्यालय बनाया और जिले का नाम खीरी रखा

sar-par-bandhe-kafan-ho-shahido-ki-toliImage Source: Wikipedia

प्रचुर वन सम्पदा होने के कारण 1859 मे जिले को पिछडा जिला घोषित कर अंग्रेजो ने शिकारगाह बना लिया । परगना पलिया और खैरीगढ मे यह कानून लागू हुआ कि किसान हर साल अपनी जमीन से बेदखल हो जाता था ।

कांग्रेस के गठन और महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन की जिले मे जोरदार प्रतिक्रिया हुई । जिले मे आठ हजार लोग कांग्रेस के सदस्य बने, तिलक स्वराज्य फंड मे 40 हजार रुपया जमा किया गया । खिलाफत आन्दोलन से प्रेरित होकर 26 अगस्त 1920 को बकरीद के दिन नसीरुद्दीन मौजी,  बशीर और माशूक अली एक गठरी मे तलवारे छिपाकर डिप्टी कमिश्नर बिलोबी के बंगले पर पहुंचे और बिलोबी का कत्ल कर दिया । इस मामले मे तीनो व्यक्तियो को फांसी की सजा हुई ।

लखीमपुर शहर मे स्थित बिलोबी के बंगले को ही नसीरुदीन मौजी स्मारक घोषित कर दिया गया है । उस समय निघासन तहसील के गांव धौरहरा मे राजा इन्द्र विक्रम सिह के परिवार के एकमात्र जीवित बचे सदस्य क्षत्रपाल सिह के नेतृत्व मे एक संगठन खडा हुआ । सर्वश्री छंगा मिश्र, उमाप्रसाद मिश्र, और काजी मुख्तार अहमद आदि उनके अभिन्न सहयोगी थे । यह संगठन हसनपुर कटौली से लेकर खेसवाही और बैरिया गांव तक करीब 50 मील के दायरे मे सक्रिय था । यह लोग गाँधी के अहिसक युद्ध के लिए तैयार थे । आन्दोलन की भूमिका मे हिन्दू मुस्लिम एकता की मजबूती देख अंग्रेजो ने फूट डालने की रणनीति बनाई

धौरहरा के लाल खाँ ने दो गाय खरीदी तो अंग्रेज भक्त गद्दारो ने अफवाह फैलाई कि इन्हे वध के लिए खरीदा है । स्थिति बिगडते देख काजी मुख्तार अहमद आदि ने लाल खाँ को मस्जिद मे लाकर कुश की पैंती पहना कर गायो को दान करा दिया और बाकायदा इसका जुलूस निकाला गया । आन्दोलन से घबराए अंग्रेज कप्तान ने छंगा मिश्र व उनके भाई श्यामलाल व बनवारी लाल को बन्दी बना लिया । इनके साथ ही क्षत्रपाल सिह, काजी मुख्तार अहमद, उमा प्रसाद मिश्र आदि 14 लोग बन्दी बनाए गए ।

खबर पाकर हजारो की भीड ने धौरहरा थाना घेर लिया इससे घबरा कर कप्तान इन्हे तीसरे दिन लखीमपुर हाजिर होने का आदेश देकर चला गया । तीसरे दिन क्षत्रपाल सिह की अगुवाई मे 14 वीरो का यह जत्था केसरिया कपडे पहन कर तिरंगा लहराते हुए और उस समय का लोकप्रिय गीत " सिर पर बाँधे कफनवा हो, शहीदो की टोली निकली" गाता कचहरी पहुंचा। गिरफ्तारी के बाद इन सब को चार वर्ष तक कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई । क्रमशः......

दीपेन्द्र मिश्र, धौरहरा  (लखीमपुर)

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Deependra Mishra

मुझको मेरे वजूद की हद तक न जानिये। बेहद हूँ...बेहिसाब हूँ...बे - इंतहा हूँ मैँ...

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