"जंग-ए-आज़ादी और हमारा जिला  (भाग-5)"

[ नेता जी के आगमन के बाद युवा हुआ आन्दोलन,  छात्र चेतना का केन्द्र बना युवराजदत्त विद्यालय ]

साल 1931 का एक बहुत ही मार्मिक प्रसंग मिलता है जो आजादी के दीवानो की दीवानगी बयान करने के लिए काफी है। भीरा के बाबूराम जो पटवारी की नौकरी छोड कर आजादी की लडाई मे कूदे थे और जेल गए थे।


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जेल मे रहने के दौरान ही वह सन्यासी हो गए और बाकी जीवन गृहस्थी से दूर रहकर अंग्रेजी राज मिटाने की शपथ ली। जब वह जेल गए थे तब उनकी पत्नी गर्भवती थी, और उनके जेल जाने के बाद उसने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम शंकर सहाय था। लेकिन जेल मे बाबूराम जी स्वामी राम स्वरूप सन्यासी बन चुके थे।

जब वह जेल से छूटे और भीरा गांव गए तो अपने घर के दरवाजे पर खडे होकर सन्यास धर्म के अनुसार उन्होने पहली भिक्षा अपनी पत्नी को माँ कहकर मांगी। आवाज सुनकर उनकी पत्नी बाहर आई और पति को इस वेश मे देखकर वापस लौट गई। कुछ देर बाद वह अपने कपडो पर हल्दी छिडक कर और नन्हे से बच्चे को गोद मे लेकर फिर बाहर आई और पहले कभी ना देखे गए बच्चे और खुद को सन्यासी की झोली मे डाल दिया

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किसी प्रकार समझौता हुआ और बाबूराम जी की पत्नी निर्मला देवी स्वामी रामस्वरूप सन्यासी की शिष्या बन गई। इसके बाद निर्मला देवी ने भी स्वाधीनता संघर्ष मे पति के साथ अनेको बार जेल यात्रा की और 1942 मे तो उन्होने संघर्ष की मिसाल कायम कर दी। उनके जीवन की शुद्धता और द्रढता का प्रमाण था कि जीवन पर्यंत साथ रहकर भी उनकी दूसरी संतान नही हुई। 1935 -36 तक आते आते कांग्रेस का संगठन जिले मे खासा मजबूत हो चुका था।

स्थानीय निकाय चुनाओ मे कांग्रेस ने भाग लिया और म्यूनिसिपल बोर्ड मे पांच मे से तीन तथा जिला बोर्ड के चुनाव मे 18 मे से 10 उम्मीदवार कांग्रेस के जीते। असेम्बली चुनाव के लिए जिले मे दो साधारण सीटे थी। आठ फरवरी 1937 को इनके लिए मतदान हुआ और दोनो पर कांग्रेस के उम्मीदवार जीते। इस बीच जिले भर मे आन्दोलन, दौरे, सभाओ और जुलूस का क्रम अनवरत जारी रहा।

किसान संगठन भी फैल चुका था और 1937 मे इसकी सदस्य संख्या हजारो मे थी। वही 1938 तक आते आते कांग्रेस की सदस्य संख्या 20 हजार 96 हो चुकी थी। 30 नवम्बर 1938 को जिला कांग्रेस कमेटी, जिला किसान सभा और कांग्रेस समाजवादी पार्टी के बैनर तले लगभग 20 हजार किसानो का जुलूस लखीमपुर नगर मे घूमा और एक बजे रामलीला मैदान मे विशाल सभा हुई। इस सभा मे मौलाना मुहम्मद कासिम, गोविन्द सहाय और रफी अहमद किदवई आए थे। पहला खीरी युवा सम्मेलन 25 जनवरी 1939 को मन्मथ नाथ गुप्त की अध्यक्षता मे हुआ। इसमे भूपेन्द्र नाथ सान्याल, प्रेम किशन खन्ना, मुंशी सिह आदि क्रांतिकारी नेता आए थे। ऐसे विभिन्न आयोजनो के बीच सन 1939 - 40 मे ग्राम फतेहपुर निवासी पंडित बंशीधर, पचपेडी के भगवानदीन और चौवापुर पडरी के शंकर सिह की वहाँ के जमीदारो ने बर्बरता पूर्वक हत्या करा दी।

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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पहली बार 22 जनवरी और दूसरी बार 22 जून 1940 को लखीमपुर आए थे। उन्हे गोला मजदूर सभा और युवक संघ की तरफ से थैली भेंट की गई थी। छात्र संघ ने भी नेता जी को मान पत्र भेंट किया था। नेता जी के आगमन से जिले के स्वाधीनता संग्राम को नई स्फूर्ति मिली और अंग्रेजो का दमन चक्र भी खूब चला जिसने इस आग को और भडकाया। करन सिह की अध्यक्षता मे विद्यार्थियो ने सभा कर संघर्ष की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने की प्रतिज्ञा की।

उन दिनो ओयल कस्बे का युवराज दत्त विद्यालय नई पीढी मे जागृति संचार का प्रमुख केन्द्र था। यही पर बैठक कर स्टूडेंट फेडरेशन का गठन किया गया जिसके मंत्री करन सिह थे। लखीमपुर मे भैयालाल के जेल जाने के बाद ढखवा गांव के ठाकुर गंगा सिह, लखीमपुर की गोदावरी देवी, भीखमपुर के साधूराम शुक्ल, मन्योरा के बंशीधर शुक्ल, आदि सत्याग्रह का संचालन कर रहे थे। अंग्रेजो ने इन सबके साथ 256 स्वयमसेवको को जेल भेजा। इन्हे लम्बी सजाए और भारी जुर्माने हुए। विद्यार्थी आन्दोलन के अगुवा राजनारायण मिश्र और करन सिह भी इनमे शामिल थे। क्रमशः.....

दीपेन्द्र मिश्र, धौरहरा (लखीमपुर)

 


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Deependra Mishra

मुझको मेरे वजूद की हद तक न जानिये। बेहद हूँ...बेहिसाब हूँ...बे - इंतहा हूँ मैँ...

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