"जंग-ए-आज़ादी और हमारा जिला  (भाग-4)"

 

वर्ष 1930 के बाद के समय मे खीरी जिला कांग्रेस की गतिविधियो का केन्द्र रहा । कांग्रेस के लोगो ने समझ लिया था कि बिना किसान को जोडे आजादी की लडाई मे सफलता सम्भव नही है। अतः जिले मे एक मजबूत किसान आन्दोलन छेडा गया ।


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किसानो से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाने के उद्देश्य से कांग्रेस नेता उनकी समस्याओ मे गहरी रुचि लेने लगे । स्वदेशी आन्दोलन के चलते विदेशी वस्तुओ के बायकाट और स्वदेशी वस्तुओ के प्रति लगाव की भावना मे उबाल आया । दो फरवरी 1931 को खीरी स्वदेशी संघ की स्थापना हुई । बाबू बंशीधर वकील इसके सभापति और बंशीधर मिश्र मंत्री बने । इससे पहले सात जनवरी की एक घटना उल्लेखनीय है । जब शहर के नौरंगाबाद के पास अरहर के एक खेत मे बम फटने से कुछ लोग घायल हो गए थे ।

Indian-farmer-and-british-government

इसे अंग्रेज पुलिस ने खीरी बम कांड का नाम दिया । इस मामले मे 12 लोग गिरफ्तार किए गए । जगदम्बा प्रसाद मिश्र, बलभद्र सिह, दाताराम, पराग दत्त, श्रीधर मिश्र, श्रीराम पितरिया, और साधूराम शुक्ल को दो से छः वर्ष तक कैद की सजाए हुई । राम स्वरूप त्रिपाठी, चिरौंजी पासी व अन्य को सेशन कोर्ट से छोड दिया गया । हलांकि इस घटना का प्रांतीय क्रांतिकारी दल से कोई सम्बन्ध नही था फिर भी यह घटना जिले मे भीतर ही सुलग रही क्रांतिकारी भावना का प्रतीक तो थी ही । 13 जनवरी 1931 को जिले भर की कांग्रेस कमेटियो को अवैध घोषित कर दिया गया । कांग्रेस से सम्बन्धित अनेक लोगो को फरवरी मे धारा 109, 143, तथा 24 पुलिस एक्ट के तहत छः माह से एक वर्ष तक जेल भेज दिया गया ।

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खीरी स्वदेशी संघ ने 26 फरवरी को स्वदेशी वस्तुओ के प्रयोग के लिए अपील छपवा कर बाँटी । 1931 मे जिले मे जहाँ भी कांफ्रेंस हुए उसमे स्वदेशी वस्तुओ के प्रयोग को लेकर प्रस्ताव पारित किए गए और प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए । गाँधी - इरविन समझौते के अनुसार नौ मार्च 1931 को सभी राजनौतिक बन्दी रिहा कर दिए गए । इस मौके पर जगह - जगह जुलूस निकले, रोशनी की गई और कई दिनो तक दावतो का दौर चला ।

25 व 26 अप्रैल को मोहम्मदी मे जिला राजनैतिक कांफ्रेंस हुई जिसमे उमा नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन, पंडित कृष्णकांत मालवीय, मौलाना साहिद, मौलाना अब्दुल हलीम, बाबा रामचन्द्र, और पंडित सीताराम आदि ने भाग लिया। किसानो के लगान सम्बन्धी मुद्दो को लेकर हस्ताक्षर अभियान चलाया गया । इस सिलसिले मे बंशीधर मिश्र, रामरतन, रामलाल व रघुबर दयाल पर धारा 108 व 107 के तहत मुकदमा चलाया गया ।

1931 के उत्तरार्ध मे हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए लखीमपुर, पलिया, मोहम्मदी और गोला मे सभाएं की गई और संयुक्त कमेटियाँ बनाई गई। यह कमेटियाँ गांव गांव मे राष्ट्रीय सप्ताह, मादक वस्तु निषेध दिवस, भारत दिवस, धन संग्रह दिवस, महात्मा गाँधी दिवस, चरखा दिवस, खद्दर दिवस, झण्डा दिवस जैसे आयोजन कराती थी जिससे जिले की राजनैतिक सरगर्मी कम नही होने पाती थी । 17, 18, 19, 20, 30 व 31 अक्टूबर, 25, 26, 27, नवम्बर, पांच व छः फिर 30 व 31 दिसम्बर को जिले के विभिन्न स्थानो पर बडी सभाए और कांफ्रेंस हुई ।

सरकारी नजरिए से स्थिति भयावह हो चुकी थी, इसलिए ब्रिटिश सत्ता ने कठोर दमन शुरू किया। पलिया मे रामरतन, रामदीन, सुन्दरलाल, रामलाल आदि तमाम लोगो को गिरफ्तार किया गया। चार जनवरी 1932 को दो मार्च तक के लिए जिले मे धारा 144 लागू की गई जिसका जिले भर मे प्रतिरोध हुआ और सैकडो गिरफ्तारियाँ हुई ।

चूंकि कांग्रेस अवैध संगठन घोषित किया जा चुका था इसलिए उसके हर कार्य और कार्यालय पर पुलिस ने जमकर डण्डे बरसाए । 13 फरवरी 1933 को जिले मे गवर्नर के आगमन पर विरोध मे आधे दिन की हडताल हुई । चार मार्च व चार अप्रैल को गाँधी दिवस पर भी हडताल हुई ।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन मे 103 लोग गिरफ्तार हुए, इनमे 79 को सजा हुई । यह आन्दोलन छः जून 1934 तक चला और सात जून को कांग्रेस पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया । 19 जून से जिला कांग्रेस कार्याल फिर से खुल गया और उसकी गतिविधियाँ शुरू हो गई । इस दौर मे चन्द्रभानु गुप्त, सेठ दामोदर स्वरूप और मोहन लाल सक्सेना ने आन्दोलन की कमान संभाली। क्रमशः........

दीपेन्द्र मिश्र, धौरहरा (लखीमपुर)

 


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Deependra Mishra

मुझको मेरे वजूद की हद तक न जानिये। बेहद हूँ...बेहिसाब हूँ...बे - इंतहा हूँ मैँ...

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