"जंग-ए-आज़ादी और हमारा जिला  (भाग-3)"

 

आजादी के दीवाने 14 वीरो को सजा के बाद जिले मे आन्दोलन की आग और ज्यादा भडक उठी । गांव - गांव मे आन्दोलन और दमन का चक्र खूब चला । धौरहरा, ईसानगर, बैरिया, करौहाँ, सिंगाही, पलिया आदि गांवो से 72 स्वयसेवक गिरफ्तार किए गए । सामूहिक जुर्माना, जमीनो की नीलामी, शारीरिक यातनाओ जैसे अंग्रेजी जुल्म मानो बरस रहे थे ।


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कुछ समय बाद धौरहरा के छंगा मिश्र के पिता के पास झूठी खबर भेजी गई कि उनके छोटे बेटे बनवारी लाल का जेल मे देहांत हो गया है । इससे आहत पिता ने पलक झपकते ही अपनी देह छोड दी । सरकारी रिकार्ड के मुताबिक जिस दिन इनका एकादशा हो रहा था अंग्रेजो के चाटुकार रायबहादुर परमेश्वरदीन ने एकतरफा डिग्री लेकर छंगा मिश्र के परिवार की सम्पत्ति की कुर्की कर ली । जनता का कोई भी आदमी मिश्र जी की सम्पत्ति की बोली लगाने नही आया तो राय बहादुर ने अपने ही परिवार के एक व्यक्ति के नाम सब कुछ कौडियो के भाव नीलाम कर दिया ।

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इस नीलामी मे 150 गाय, 70 से अधिक भैंसे, मकान का कुल सामान, मकान और कोनिया गांव मे 35 बीघा जमीन थी । जरा सी देर मे धौरहरा का सबसे सम्पन्न परिवार दाने दाने को मोहताज कर दिया गया । तीनो भाई जेल मे थे, पिता का स्वर्गवास हो चुका था, घर मे केवल छोटे बच्चे और महिलाए थी । इन्हे भी रायबहादुर ने घर के बाद धौरहरा से भी बाहर कर दिया ।

दाने दाने को मोहताज की गई बलिदानी परिवार की यह महिलाए और छोटे छोटे बच्चे यहाँ से कुछ किलोमीटर दूर फूस की मडैया डाल कर रहते रहे। बिजुआ के कुँवर प्रताप सिह की अगुवाई मे भीरा, बिजुआ, मूडा सावरान, अलीगंज, तेन्दुवा, श्रीनगर, बरौला, फूलबेहड, आदि सैकडो गांवो मे हजारो स्वयसेवक दिन रात आजादी की अलख जगा रहे थे । बिजुआ मे जनता ने अंग्रेज सैनिको का बहिष्कार कर कुएँ से एक लोटा पानी भी नही लेने दिया ।

एक परिवार ने इनकी मदद की तो गांव के लोगो ने कुएँ मे मरा हुआ कुत्ता फेंक दिया । मोहम्मदी के मक्कू खाँ और जगदीश प्रसाद, मितौली के पंडित वासुदेव, लखीमपुर के हरनाम सुन्दर लाल, बिसवाँ के मुंशी गिरिजादयाल, आदि दर्जनो लोग अलग अलग स्थानो पर स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे ।

वर्ष 1926 से 1930 के कालखण्ड मे जवाहरलाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी, महात्मा गाँधी, कस्तूरबा, आचार्य कृपलानी जैसे लोग भी जिले मे आए और आन्दोलन को ऊर्जा दी । यह पंडित बंशीधर मिश्र के प्रयास से हुआ । सविनय अवज्ञा आन्दोलन मे भी खीरी जिले ने भरपूर हिस्सा लिया लेकिन नमक सत्याग्रह यहाँ सफल नही रहा । इसकी जगह खीरी मे जंगल सत्याग्रह चलाया गया । इसके तहत निर्णय किया गया कि अंग्रेज सरकार को जंगल की नीलामी नही करने देंगे। जंगल नीलामी की तिथि 28, 29, और 30 अप्रैल 1930 थी, लेकिन प्रतिरोध इतना ज्यादा था कि सरकार को नीलामी तिथि बदल कर 14 अगस्त करनी पडी ।

18 अगस्त तक चले जंगल सत्याग्रह को काबू करने के लिए अंग्रेज शासन ने जमकर दमनात्मक कार्रवाइयाँ की और सैकडो लोग जेल भेजे गए । एक शांत जुलूस मे शामिल महिलाओ और बच्चो पर भी अंग्रेजो ने जमकर लाठियाँ भांजी। क्रमशः.......

दीपेन्द्र मिश्र, धौरहरा (लखीमपुर)


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Deependra Mishra

मुझको मेरे वजूद की हद तक न जानिये। बेहद हूँ...बेहिसाब हूँ...बे - इंतहा हूँ मैँ...

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