"जंग-ए-आज़ादी और हमारा जिला  (भाग-6)"

शीर्षक: "अब कर न बहादुर देरी..... बज गई वीर रण भेरी"

 

256 सत्याग्रहियो को जेल भेजने के बाद भी सत्याग्रह का जोर जिले मे कम नही हुआ। सन 1941 तक विद्यार्थी आन्दोलन भी उभर चुका था और पूरे जोश मे था। अंग्रेजो ने घबराकर गिरफ्तारियाँ बन्द कर दी। आजादी के दीवाने टोली बना कर गांव गांव घूमते और तिरंगा झंडा लेकर ब्रिटिश सरकार का विरोध करते। " ले आन बान, उर भर उफान, कर दे पयान, रख देश शान। अब कर न बहादुर देरी, बज गई वीर रण भेरी॥"


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यह जोशीला गीत जिले भर मे हर गांव मे गूंज रहा था। ग्राम भेठिया के नत्थूलाल जी जेल मे बीमार हुए और बलरामपुर अस्पताल मे उनकी मौत हो गई। ग्राम सिसावा के भूधरलाल के जेल मे रहते ही उनके पुत्र, पिता और दो भाँजो की मृत्यु हुई, लेकिन उन्होने बडे धैर्य से कारावास भुगता। बनका ग्राम के एक दूसरे नत्थूलाल के सत्याग्रह करने की तिथि निश्चित थी, इसी बीच उनके भाई का देहांत हो गया। लेकिन नत्थूलाल जी ने निश्चित तिथि पर भाई के शोक को भुला कर सत्याग्रह किया और जेल गए।

जंग-ए-आज़ादी और हमारा जिला 

यह थी स्वतंत्रता की दीवानगी जो इतिहास के पन्नो मे दर्ज है। 1941 के अंत मे सिंगापुर को जापान ने अंग्रेजो से छीन लिया। इससे हडबडाई ब्रिटिश सरकार ने देश भर मे सभी सत्याग्रहियो को एक साथ रिहा कर दिया। केवल उन्हे जेल मे रखा गया जिन्हे सरकार बेहद खतरनाक मानती थी।

नौ अगस्त 1942 को मुम्बई (तब बम्बई) मे अखिल भारतीय कांग्रेस सम्मेलन होना था। इसमे अंग्रेजो के खिलाफ अंतिम युद्ध छेडने और भारत छोडो आन्दोलन का आगाज किया जाता। लेकिन अंग्रेज सरकार ने ऐन वक्त पर बडे पैमाने पर गिरफ्तारियाँ शुरू कर दी। लगभग सभी नेता जेल चले गए, लेकिन जनता ने नेतृत्व विहीन रहकर आजादी का अंतिम युद्ध किया। खीरी जिले मे भारत छोडो आन्दोलन का गहरा असर पडा था, जिले के कई स्थानो से ब्रिटिश सत्ता उखाड फेंकी गई।

 

भीखमपुर गांव से राजनारायण ने बजाया क्रांति का बिगुल 

लखीमपुर, ओयल, गोला, मोहम्मदी आदि मे अभूतपूर्व हडताल हुई। ओयल के युवराजदत्त विद्यालय मे छात्रो ने मीटिंग की, और जोश मे आकर पुलिस स्टेशन मे आग लगा दी। छात्रो ने रेलवे के तार काट डाले, और पटरियाँ उखाडी और करन सिह, राजनारायण मिश्र, बालमुकुन्द आदि के नेतृत्व मे छात्र मस्ती मे देश भक्ति के गीत गाते हुए घूमे " बज गई वीर रण भेरी...."।

बाबा शंकर दास, सुखदेव प्रसाद और ढखवा के गंगा सिह के साथ नागरिको ने इन क्रांतिकारी छात्रो का बहुत स्वागत किया और प्रोत्साहन दिया। इसके बाद छात्रो और जनता ने बैठक कर गिरफ्तारी से बचते हुए मिलकर संघर्ष करने का निर्णय किया। फिर जिले भर मे रेलवे स्टेशन, पोस्ट आफिस, रेल पटरी और तार आदि नष्ट करने का सिलसिला चल पडा। भीखमपुर गांव मे राजनारायण मिश्र ने, भाई रूपनारायण, बाबूराम, कैलाश नाथ, भगवानदास मिश्र व साधूराम शुक्ल के साथ मिल कर सशस्त्र क्रांति का बिगुल फूंका और शस्त्र एकत्र करने लगे। बहुत ले लोगो ने इस काम के लिए अपनी बन्दूके दे दी। इनलोगो ने आस पास के दासता के सभी चिन्ह मिटा दिए।

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14 अगस्त को राजनारायण दो साथियो के साथ महमूदाबाद के कोठार मे जिलेदार से बन्दूक मांगने गए। जिलेदार ने बन्दूक देने की बजाय इनपर ही तान दी, मजबूरन इनलोगो ने क्रांति की पहली गोली इस जिलेदार को ही मारी। इस कांड के बाद तीन दिन तक राजनारायण आस पास के अंग्रेजी राज चिन्हो को मिटाते रहे और इस इलाके को आजाद घोषित कर दिया। 18 अगस्त को अंग्रेजी फौज ने चाटुकारो की मदद से गांव पर फिर कब्जा कर लिया, लेकिन गांव के लोग जंगल मे फैल गए और लगातार आक्रमण करते रहे।

 

आखिरी सांस तक रम्पा के हाथ से नही छूटा तिरंगा

एक दिन फौज और इन क्रांतिकारियो का आमना सामना हो गया। डटकर गोलियाँ चली और अंग्रेजी फौज को पीछे हटना पडा। इसी बीच एक चाटुकार ने उस दिन क्रांतिकारी टोली का नेतृत्व कर रहे गोला गोकर्णनाथ के ग्राम संसारपुर निवासी रम्पा तेली पर पीछे से हमला कर दिया।

रम्पा को युद्धस्थल मे ही वीरगति मिली। जीवन के अंतिम क्षण मे भी रम्पा के हाथो मे तिरंगा झंडा था जिसे वह सीधा रखने की कोशिश कर रहे थे। इसी के साथ "इंकलाब जिन्दाबाद", और "हम आजाद है" के उनके अंतिम शब्द उनकी लडखडाती आवाज के साथ अनंत मे विलीन होकर अमर हो गए। वासुदेव मिश्र ने मितौली के आजाद होने की घोषणा की।

उनके पुत्र भद्रसेन, पचदेवरा के मैकूलाल गुप्त, व दरी उदयपुर के चेतराम ने वहाँ के सभी सरकारी चिन्हो को नष्ट कर दिया। यमुनादीन, रामऔतार शर्मा और बहुत से लोग सन्यासी के वेश मे निघासन चले आए। घाटो की नावो पर कब्जा कर के पलिया के पुल को उडाने के बाद निघासन तहसील को आजाद घोषित करने की उनकी योजना थी। लेकिन वह चाटुकारो के चलते सफल नही हो पाई। लेकिन मैलानी, गोला और आस - पास का इलाका ग्राम कुकुहापुर के द्धारिका प्रसाद और उनके साथियो के कारण काफी समय तक आजाद रहा। क्रमशः......

 


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Deependra Mishra

मुझको मेरे वजूद की हद तक न जानिये। बेहद हूँ...बेहिसाब हूँ...बे - इंतहा हूँ मैँ...

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