"जंग-ए-आज़ादी और हमारा जिला  (भाग-7)" (अंतिम कडी)

शीर्षक: शहीद राजनारायण की शहादत पर रो पडा था जल्लाद !

 

1942 मे जिले के जिन क्षेत्रो को क्रांतिकारियो ने आजाद किया था, कुछ दिन बाद ही अंग्रेजो ने उन पर फिर कब्जा कर लिया। भीखमपुर गांव पर झल्लाए अंग्रेजो का कहर इस कदर बरपा जिसे शब्द दे पाना मुश्किल है


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पूरे गांव पर मुकदमा चलाया, सौ लोगो को 20 - 20 साल की सजा हुई। राजनारायण मिश्र को फरार घोषित कर उन्हे जिन्दा या मुर्दा लाने वाले को 500 रुपए का इनाम घोषित किया गया। उनके बडे भाई बाबूराम को 38 साल का कारावास हुआ। पुलिस के आतंक से गांव के लोग घर बार छोड कर जंगल और दूसरी जगहो पर भाग गए थे। कुछ वृद्ध पुरुष व स्त्री गांव मे बचे थे।

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बुरी तरह खीझे अंग्रेजो ने गांव के सभी घरो को खोदवा डाला। बूढे स्त्री पुरुषो को बैल की तरह माची से जोत कर घरो पर हल चलवाया गया, उन्हे चाबुक से पीटा तथा पूरे गांव और खेतो को नष्ट कर नमक बोया गया। ऐसा ही कहर सिसावाँ, मडिहा, पचदेवरा, मितौली आदि अनेक गांवो पर भी बरपा। बेतहाशा और अमानवीय दमन के चलते पूरे जिले मे शमशान जैसी शांति छा गई। क्रांति का सफलतापूर्वक दमन कर लेने की खुशी मे जिलाधीश ने विलोबी मेमोरियल भवन मे कवि सम्मेलन व मुशायरे का आयोजन किया।

लेकिन क्रांति की आग दबी जरूर थी, बुझी नही थी| एडवोकेट रघुनन्दन प्रसाद "इन्द्र" ने शहीदो के प्रति मार्मिक गज़ल लिखी और एक दिन जब मुशायरा अपने शबाब पर था लखीमपुर के कमाल अहमद रिजवी ने पूरे जोश के साथ जोर जोर से वह गज़ल पढनी और उसकी प्रतियाँ लोगो मे बांटनी शुरू कर दी। जब तक अंग्रेज अफसर कुछ समझ पाते पूरे हाल मे वन्दे मातरम, हम आजाद है, इंकलाब जिन्दाबाद की सदाएँ गूजने लगी और आयोजन ध्वस्त हो गया।

छिपे हुए कांग्रेस जनो और क्रांतिकारियो ने मिलकर नेपाल की सीमा से लगे दुधवा और गौरीफंटा के जंगलो मे एक कैम्प चलाया और सैनिक ट्रेनिंग ली। इसके बाद लाखो रुपए की इस सैनिक सामग्री को इकट्ठा कर आग लगा दी, यह आग कई दिन जलती रही। कुकहापुर के द्धारिका प्रसाद पर राजद्रोह का मुकदमा चला और इन्हे मृत्यु दण्ड मिला जिसे बाद मे आजीवन कारावास मे बदल दिया गया। उधर फरार और इनाम घोषित किए जाने के बाद राजनारायण मिश्र ने यह जिला छोड दिया। लेकिन वह नाम व गांव बदल कर देश के विभिन्न भागो मे घूमते हुए क्रांति की आग जलाते रहे

मध्य प्रदेश मे इन्हे दो माह नजरबन्द रहना पडा, बम्बई प्रांत मे भी नाम व गांव छिपाकर इन्होने छः माह की सजा भुगती। अक्टूबर 1943 मे बम्बई जेल से छूटने के बाद ये फिर उत्तर प्रदेश आए और मेरठ मे गाँधी आश्रम के एक कार्यकर्ता के यहाँ रुके।

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यहाँ इन्होने अपना वास्तविक परिचय दे दिया और यही चूक हुई। इनाम के लालची चाटुकारो की साजिश के चलते इन्हे गिरफ्तार कर लिया गया और पुलिस इन्हे लखीमपुर ले आई। उनकी पत्नी विद्या देवी ने अपने जेवर तक बेच कर मुकदमा लडा लेकिन राजनारायण मिश्र के नाम तक से खौफ खाती ब्रिटिश सत्ता ने न्याय प्रक्रिया के सारे नियम ताक पर रखकर 27 जून 1944 को इन्हे फांसी की सजा सुना दी।

जब इन्हे लखनऊ जेल मे ले जाया गया तो उसी जेल मे बडे भाई बाबूराम 38 वर्ष जेल की सजा काट रहे थे। लेकिन उनसे मिलने से राजनारायण मिश्र ने इसलिए मना कर दिया कि उन्हे देख कर बडा भाई अंग्रेज सत्ता से लडने का साहस ना छोड दे। अंतिम समय मे जब उनकी पत्नी विद्या देवी एकमात्र शिशु को गोद मे लेकर मिलने गई तो वह अपने आंसू नही रोक सकी, लेकिन मिश्र जी ने उन्हे बातो बातो मे हंसा दिया

पत्नी को उन्होने वर्धा जाकर गाँधी जी की छत्रछाया मे रहने और देश के लिए जो बन पडे करने की सलाह दी। पत्नी ने अंतिम प्रणाम के लिए एकमात्र प्राणप्यारे शिशु को जब उनके चरणो मे झुकाया तो आशीर्वाद देते हुए उनके शब्द थे "विद्या, इसे ऐसी शिक्षा देना कि यह देश के लिए मेरी तरह ही अपने को न्योछावर कर सके "। भीखमपुर के पंडित बलदेव प्रसाद और तुलसा देवी का यह वीर पुत्र 24 वर्ष की मचलती जवानी मे नौ दिसम्बर 1944 को प्रातः लखनऊ जेल मे फांसी पर लटका दिया गया।

इतिहास बताता है कि 27 जून से नौ दिसम्बर फांसी के दिन तक शहीद राजनारायण का वजन छः पौंड बढ गया था। जब इन्हे फांसी के लिए ले जाया गया तो तख्ते पर खडे होकर भी इन्होने वन्दे मातरम गाया । फांसी के फन्दे पर खडे इस वीर की खुशमिजाजी देख पत्थर दिल माना जाने वाला जल्लाद और जेलर भी फूट कर रो पडा, लेकिन आजादी का यह दीवाना हंसता ही रहा..हंसता ही रहा और हंसते हंसते अनंत मे चला गया।

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सन 1857 मे पहली आहुति देकर स्वाधीनता आन्दोलन का जो यज्ञ शहीद मंगल पांडे ने शुरू किया था उसमे खीरी के शहीद राजनारायण की शहादद "पूर्ण आहुति" बनी । इस पूर्ण आहुति की आंच देश भर मे इस कदर फैली कि तीन साल के भीतर ही भारत से अंग्रेज सत्ता उखड गई और 15 अगस्त 1947 को हम आजाद हो गए

जब रण करने को निकलेंगे स्वतंत्रता के दीवाने। धरा धंसेगी, प्रलय मचेगी, व्योम लगेगा चकराने ॥

विराम॥

दीपेन्द्र मिश्र, धौरहरा (लखीमपुर)

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Deependra Mishra

मुझको मेरे वजूद की हद तक न जानिये। बेहद हूँ...बेहिसाब हूँ...बे - इंतहा हूँ मैँ...

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